गोलू और हूँ-हूँ वाली लोरी

चाँदनी रात में गोलू की आँखों में नींद नहीं थी। टहलते-टहलते उसे बरगद के नीचे नन्हा बंदर मुन्नू मिलता है, जिसे भी नींद नहीं आ रही। गोलू उसे अपनी पीठ पर बिठाकर धीरे-धीरे हूँ… हूँ… गुनगुनाता है। मुन्नू सो जाता है — और गुनगुनाते-गुनगुनाते गोलू की आँखें भी भारी हो जाती हैं।

३ मिनट की कहानी

इस कहानी का दिल

गोलू सीखता है कि किसी और को चैन देने से अपना मन भी शांत हो जाता है।